अर्थव्यवस्था

यहाँ के लोगों की अर्थव्यवस्था जंगलों, कृषि और खनिजों पर आधारित है।

  1. कृषि : –  यहाँ बड़ी संख्या में लोग कृषि कार्यो में लगे हुए हैं। धान, मक्का, अनाज, गेहूं, तेल बीज आदि की खेती  यहाँ आम है। लोग या तो कृषि मजदूर या किसान के रूप में काम कर रहे हैं। यहाँ पर खरीफ और रब्बी  दो मुख्य कृषि फसल  हैं। फसलों के अच्छे उत्पादन के लिए यहाँ के लोग कर्मा उत्सव बड़े धूम धाम से मानते हैं।
  2. वन : –  4211.2508 वर्ग किलोमीटर के कुल भौगोलिक क्षेत्र में, वन क्षेत्र लगभग 2010.2245 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ के आदिवासियों की अर्थव्यवस्था वन उत्पादो पर निर्भर करती है। केंदू के पत्ते, बांस और इसके विनिर्मित उत्पाद, महुआ, फलों, पत्ते (दोना, पत्तल का निर्माण होता है), लाह,  आदि लोगों की आर्थिक गतिविधि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ के लोग भोजन के लिए जानवरों का भी शिकार करते हैं और ‘जनी शिकार ‘ त्योहार इस शिकार से संबंधित है।
  3. खान और खनिज: – भूवैज्ञानिक रिपोर्टों का कहना है कि यह जिला  विभिन्न खनिज के मामले में बहुत समृद्ध है। इसमें कोयला, बॉक्साइट, लेटराइट, डोलोमाइट, और ग्रेफाइट आदि की बहुतायत है। ग्रेनाइट, क्वार्ट्ज, फायरक्ले, फेल्स्फोर आदि खनिजों की खुदाई और अन्वेषण के कारन  यहाँ  के निवासियों को कुछ हद तक नौकरी के अवसर प्रदान हो  चुके हैं क्योंकि इन खनिजों का बड़े पैमाने पर पूरी तरह से पता लगाया नहीं गया है और जिले में कोई खनिज आधारित उद्योग नहीं हैं।
  4. पशुपालन: – पशुधन की गुणवत्ता बहुत खराब है गाय, बकरी आदि स्थानीय किस्म के हैं और औसत दूध उपज बहुत कम है। लातेहार में पशुपालन की अपार संभावनाएँ  हैं।
  5. व्यापार और वाणिज्य: – पुराने महाजनों और जमींदारों की जगह, विभिन्न बैंक अपनी शाखाओं का संचालन कर रहे हैं  लेकिन यह भी सत्य  है कि अधिकांश गांव इतने बिखरे हुए हैं कि प्राथमिक व्यापार की व्यवस्था व्यापार और गांव अभी भी साहुकारों  पर निर्भर  हैं। धान की पिटाई, दोना, पत्तल  बनाने, बांस  की टोकरी बनाने, महुआ फूलों की बिक्री, लाह , केंदु  के पत्ते और अन्य छोटे वन उत्पाद व्यापारिक गतिविधियों के मुख्य घटक हैं। प्रमुख उद्योगों और रोजगार के अवसरों की अनुपस्थिति में, आर्थिक विकास के विकल्प सीमित हैं। पशुपालन, सूअर और मत्स्य पालन आदि की अच्छी संभावनाएं हैं, लेकिन यह क्षेत्र अभी भी  पूर्ण रूप से विकसित नहीं है।